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कैंसर आज केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने खड़ी सबसे गंभीर स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों में से एक बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा 8 जुलाई 2026 को जारी "ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन कैंसर 2026" ने एक बार फिर दुनिया को चेतावनी दी है कि यदि अभी प्रभावी और व्यापक कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2050 तक कैंसर के नए मामलों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 3.5 करोड़ (35 मिलियन) प्रतिवर्ष तक पहुंच सकती है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले समय में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, परिवारों और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले भारी बोझ का संकेत है। वर्तमान में हर वर्ष दुनिया भर में लगभग 2.06 करोड़ (20.6 मिलियन) नए कैंसर के मामले सामने आते हैं, जबकि करीब 1 करोड़ (10 मिलियन) लोगों की मृत्यु इस बीमारी से हो जाती है। इसका अर्थ है कि हर दिन 26,000 से अधिक लोग कैंसर के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। हृदय रोगों के बाद कैंसर आज विश्व में मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। WHO का मानना है कि इस बढ़ते संकट को रोकने के लिए केवल नई दवाइयों या आधुनिक तकनीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं को "पीपल-सेंटर्ड" यानी मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें केवल बीमारी का इलाज ही नहीं, बल्कि मरीज और उसके परिवार की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं को भी समान महत्व दिया जाए। यह रिपोर्ट WHO और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई है। इसमें राजनीतिक प्रतिबद्धता, कैंसर की रोकथाम, विशेष रूप से तंबाकू नियंत्रण, टीकाकरण कार्यक्रमों और उपचार में निवेश की विस्तृत समीक्षा की गई है। हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि इन क्षेत्रों में हुई प्रगति के बावजूद दुनिया में कैंसर की रोकथाम, समय पर जांच, उपचार और सहायक देखभाल तक पहुंच में भारी असमानता बनी हुई है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि किसी व्यक्ति के कैंसर से बचने की संभावना आज भी इस बात पर निर्भर करती है कि वह किस देश में पैदा हुआ और उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है। उदाहरण के लिए, उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर से पीड़ित लगभग 87% महिलाएं निदान के पांच वर्ष बाद भी जीवित रहती हैं, जबकि कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा केवल लगभग 42% है। इससे स्पष्ट होता है कि संसाधनों की असमान उपलब्धता लाखों लोगों के जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन चुकी है। स्थिति और भी गंभीर इसलिए है क्योंकि दुनिया के केवल एक-तिहाई से भी कम देशों ने कैंसर उपचार को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (Universal Health Coverage) का हिस्सा बनाया है। इसका सीधा अर्थ है कि करोड़ों लोग आवश्यक उपचार और दवाओं से आज भी वंचित हैं। WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने कहा कि "कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो लगभग हर परिवार को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती है। लेकिन किसी व्यक्ति के जीवित रहने का निर्णय इस बात से नहीं होना चाहिए कि वह कहां पैदा हुआ या उसकी आय कितनी है। रिपोर्ट में सामने आई असमानताएं अपरिहार्य नहीं हैं; ये हमारी नीतिगत पसंद का परिणाम हैं और मजबूत सामूहिक प्रयासों से इन्हें बदला जा सकता है।" कैंसर का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। WHO द्वारा पहली बार कैंसर से प्रभावित लोगों पर किए गए वैश्विक सर्वेक्षण में सामने आया कि कम से कम 45% मरीज आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं, आधे से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हैं, जबकि लगभग सभी देखभाल करने वाले (Caregivers) बिना भुगतान के लंबे समय तक सेवा देने, सामाजिक अलगाव और मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं। स्पष्ट है कि कैंसर केवल मरीज नहीं, पूरे परिवार के जीवन को बदल देता है। रिपोर्ट विभिन्न क्षेत्रों में कैंसर के असमान बोझ को भी उजागर करती है। वर्ष 2024 में एशिया में दुनिया के 50.7% कैंसर मामलों और 56.5% मौतों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया, जिसका प्रमुख कारण यहां की विशाल जनसंख्या है। दूसरी ओर यूरोप, जहां दुनिया की केवल लगभग 9% आबादी रहती है, वहां 21% कैंसर मामले और 20% मौतें दर्ज की गईं, जो इस क्षेत्र में कैंसर के अत्यधिक बोझ को दर्शाता है। वहीं अफ्रीका और एशिया के कई देशों में कैंसर की घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन समय पर निदान और उपचार की कमी के कारण मृत्यु दर असामान्य रूप से अधिक है। यदि कैंसर के प्रकारों की बात करें तो फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer) आज भी विश्व में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। पुरुषों में फेफड़े, प्रोस्टेट और कोलोरेक्टल कैंसर सबसे अधिक पाए जाते हैं, जबकि महिलाओं में स्तन, फेफड़े और कोलोरेक्टल कैंसर प्रमुख हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दुनिया में लगभग 40% कैंसर ऐसे जोखिम कारकों से जुड़े हैं जिन्हें रोका जा सकता है। इनमें तंबाकू सेवन, शराब का अत्यधिक उपयोग, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित आहार, वायु प्रदूषण तथा मानव पैपिलोमा वायरस (HPV), हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी और हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जैसे संक्रमण प्रमुख हैं। इसका अर्थ है कि प्रभावी जन-जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली और टीकाकरण के माध्यम से लाखों लोगों को कैंसर से बचाया जा सकता है। IARC की निदेशक डॉ. एलिज़ाबेथ वाइडरपास का कहना है कि जिन देशों ने रोकथाम संबंधी प्रभावी नीतियां अपनाई हैं, वहां कुछ प्रकार के कैंसर में कमी जरूर आई है, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्रगति अभी भी बहुत धीमी है। उनका कहना है कि आज कैंसर का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, अस्वास्थ्यकर भोजन तथा वायु प्रदूषण जैसे कारण भविष्य में और अधिक कैंसर मामलों को जन्म देंगे। इसलिए कैंसर की रोकथाम को हर देश की सर्वोच्च राजनीतिक प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले डेढ़ दशक में कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुई हैं। वर्ष 2010 के बाद से तंबाकू सेवन में 27% की कमी आई है, जिससे कई क्षेत्रों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों और मौतों में गिरावट दर्ज हुई है। टीकाकरण कार्यक्रमों, बेहतर जल, स्वच्छता एवं सफाई (WASH) तथा संक्रमण नियंत्रण उपायों के कारण संक्रमण से जुड़े कई प्रकार के कैंसर में भी कमी आई है। राजनीतिक स्तर पर भी सकारात्मक बदलाव दिखाई दिए हैं। अब 82% देशों के पास राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजना (National Cancer Control Plan) है, जबकि वर्ष 2010 में यह आंकड़ा केवल 50% था। उच्च आय वाले देशों में अधिकांश स्तन कैंसर शुरुआती अवस्था में ही पहचान लिए जाते हैं, और 74% महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग हो रही है। साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधान भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2005 से 2021 के बीच कैंसर संबंधी पंजीकृत क्लिनिकल ट्रायल्स में हर वर्ष औसतन 7.3% की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि इन उपलब्धियों का लाभ अभी तक पूरी दुनिया तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। WHO के अनुसार, शीर्ष 20 आवश्यक कैंसर दवाओं की उपलब्धता निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में केवल 9% से 54% के बीच है, जबकि उच्च आय वाले देशों में यही उपलब्धता 68% से 94% तक है। यही असमानता लाखों मरीजों के जीवन पर सीधा प्रभाव डाल रही है। WHO के सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाली और बचपन में कैंसर से जूझ चुकी क्लैरिसा शिलस्ट्रा कहती हैं कि "कैंसर केवल एक चिकित्सकीय निदान नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति और उसके पूरे परिवार के जीवन के हर पहलू को लंबे समय तक प्रभावित करता है। इसलिए नीतियां बनाते समय कैंसर से प्रभावित लोगों के वास्तविक अनुभवों को केंद्र में रखना आवश्यक है।" इसी उद्देश्य से WHO ने कैंसर नियंत्रण के लिए सात प्रमुख सिफारिशें और तीन रणनीतिक परिवर्तन प्रस्तावित किए हैं। पहला, बेहतर क्षमताएं (Better Capabilities) विकसित करते हुए कैंसर नियंत्रण को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज में शामिल किया जाए तथा स्वास्थ्यकर्मियों और संसाधनों में निवेश बढ़ाया जाए। दूसरा, बेहतर सुरक्षा (Better Protections) सुनिश्चित करते हुए कैंसर से प्रभावित लोगों के अनुभवों को नीति निर्माण के केंद्र में रखा जाए और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाया जाए। तीसरा, बेहतर मूल्य (Better Value) के तहत अनुसंधान और नवाचार को सार्वजनिक स्वास्थ्य की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए तथा आधुनिक उपचार तक समान और न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित की जाए। WHO ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आज लिए गए निर्णय आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का भविष्य तय करेंगे। यदि सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थान, निजी क्षेत्र और स्वयं समुदाय मिलकर लोगों को केंद्र में रखकर कैंसर नियंत्रण की रणनीति अपनाते हैं, तो इस बीमारी के बढ़ते बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कैंसर के खिलाफ यह लड़ाई केवल अस्पतालों की नहीं, बल्कि सरकारों, स्वास्थ्य प्रणालियों, समाज और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। समय रहते यदि रोकथाम, समय पर जांच, सुलभ उपचार और समान स्वास्थ्य सुविधाओं पर गंभीरता से निवेश किया गया, तो लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। अन्यथा WHO की यह चेतावनी कि 2050 तक कैंसर के नए मामले लगभग दोगुने हो जाएंगे, भविष्य की एक भयावह सच्चाई बन सकती है। प्रहलाद वाघेला कारोदा भारतीय