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एक सवाल से शुरू करते हैं Share on

पहले शूद्र दुश्मन थे — आज मुसलमान हैं — कल आप होंगे एक सवाल से शुरू करते हैं। आपके मोहल्ले में कोई मुसलमान नहीं है। आपके दफ्तर में कोई मुसलमान नहीं है। आपने ज़िंदगी में शायद किसी मुसलमान से कोई तकलीफ नहीं उठाई। फिर भी — जब TV खोलते हैं तो दिल में एक डर होता है। जब WhatsApp खोलते हैं तो एक गुस्सा होता है। यह डर और गुस्सा आया कहाँ से? यह सवाल एक नींव है। पहली बात: हर सत्ता को एक दुश्मन चाहिए यह कोई भारत की खास बात नहीं है। यह इंसानी मनोविज्ञान की सबसे पुरानी कमज़ोरी है। जब तक "वे" नहीं होते — "हम" की पहचान नहीं बनती। हिटलर ने यही किया। पहले यहूदी दुश्मन बने। फिर Roma। फिर विकलांग। फिर असहमत जर्मन। दुश्मन की सूची कभी छोटी नहीं हुई। हमेशा बड़ी होती गई। स्टालिन ने यही किया। पहले पूंजीपति दुश्मन थे। फिर किसान। फिर पार्टी के अपने लोग। हर बार नया दुश्मन। हर बार वही तंत्र। दूसरी बात: भारत में यह खेल हज़ारों साल पुराना है यहाँ यह खेल नया नहीं है। बस दुश्मन का चेहरा बदलता रहा है। हज़ारों साल पहले — शूद्र दुश्मन थे। उन्हें वेद सुनने का अधिकार नहीं था। उन्हें कुएं से पानी लेने का अधिकार नहीं था। उन्हें मंदिर में घुसने का अधिकार नहीं था। क्यों? क्योंकि व्यवस्था को टिके रहने के लिए एक ऐसे वर्ग की ज़रूरत थी जिसे "नीचा" बताया जा सके। जब कोई "नीचा" होता है — तो बाकी सब "ऊँचे" लगते हैं। और जब आप "ऊँचे" लगते हैं — तो आप व्यवस्था से सवाल नहीं पूछते। यही तंत्र था। यही मकसद था। Ambedkar ने यही देखा था। उन्होंने कहा — "जाति सिर्फ भेदभाव नहीं है। जाति एक ऐसी व्यवस्था है जो आपको यह भी नहीं सोचने देती कि भेदभाव गलत है।" तीसरी बात: दुश्मन बदला — तंत्र नहीं बदला 1947 में Ambedkar ने संविधान लिखा। उसमें शूद्र को इंसान का दर्जा मिला। कानूनी तौर पर। लेकिन जो तंत्र हज़ारों साल से चल रहा था — वह तंत्र तो बाकी था। उसे एक नए दुश्मन की ज़रूरत थी। और वह नया दुश्मन मिल गया। मुसलमान। सोचिए — पहले कहा जाता था — शूद्र अपवित्र है, उससे दूर रहो। अब कहा जाता है — मुसलमान खतरनाक है, उससे दूर रहो। पहले कहा जाता था — शूद्र का खाना मत खाओ। अब कहा जाता है — मुसलमान की दुकान पर मत जाओ। पहले कहा जाता था — शूद्र हमारी संस्कृति को नष्ट कर देगा। अब कहा जाता है — मुसलमान हमारी संस्कृति को नष्ट कर देगा। शब्द बदले। नाम बदला। तर्क नहीं बदला। चौथी बात: यह दिमाग में कैसे घुसता है यह एक दिन में नहीं होता। Krishnamurti ने कहा था — "आप जो सोचते हैं वह आपका विचार नहीं है। वह उस वातावरण का उत्पाद है जिसमें आप पले-बढ़े।" इसे conditioning कहते हैं। बचपन से शुरू होती है। कहानियाँ। त्योहार। नायक। खलनायक। फिर बड़े होने पर — WhatsApp forwards। YouTube videos। Primetime TV। रोज़ एक ही message। अलग-अलग रूपों में। "हिंदू खतरे में है। "वे बढ़ रहे हैं।" "वे हमारी लड़कियों को निशाना बना रहे हैं।" "वे हमारी संस्कृति को मिटाना चाहते हैं।" यह रोज़ सुनते-सुनते — एक दिन यह आपका "अपना विचार" बन जाता है। और तब आप सोचते हैं — मैं स्वतंत्र रूप से सोच रहा हूँ। लेकिन आप सिर्फ वही सोच रहे हैं जो आपसे सोचवाया गया है। पाँचवीं बात: RSS का सभ्यतागत युद्ध यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात समझनी है। RSS सिर्फ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। यह एक सांस्कृतिक परियोजना है। और इसकी रणनीति चुनाव जीतने से कहीं आगे की है। रोज़ सुबह शाखा। हर मोहल्ले में। हर शहर में। हर गाँव में। यह सिर्फ व्यायाम नहीं है। यह एक दैनिक conditioning है। हर दिन एक ही बात दोहराई जाती है — "हम हिंदू हैं। हम एक हैं। हमारा एक दुश्मन है।" यह काम चुनाव से पाँच साल पहले शुरू होता है। और चुनाव के पाँच साल बाद भी जारी रहता है। यह चुनावी राजनीति नहीं है। यह सभ्यतागत युद्ध है। और इस युद्ध में एक नियम है — जो हमारे साथ नहीं — वह दुश्मन की सेना में है। कांग्रेसी? — दुश्मन। पत्रकार जो सवाल पूछे? — दुश्मन। न्यायाधीश जो फैसला दे? — दुश्मन। इतिहासकार जो तथ्य सामने रखे? — दुश्मन। दुश्मन की परिभाषा हर दिन थोड़ी और बड़ी होती है। छठी बात: कल आप होंगे यहाँ वह बात आती है जो सबसे ज़रूरी है। और जो लोग नहीं सुनना चाहते। जो हिंदू आज सोचता है कि — "मुसलमान तो दुश्मन है ही। लेकिन मैं तो हिंदू हूँ। मैं सुरक्षित हूँ।" उसे इतिहास एक सबक देता है। हिटलर ने पहले यहूदियों को निशाना बनाया। जर्मन लोगों ने सोचा — हम तो जर्मन हैं। हम सुरक्षित हैं। फिर हिटलर ने उन जर्मनों को निशाना बनाया जो असहमत थे। दुश्मन की सूची कभी नहीं रुकती। भारत में — पहले मुसलमान। फिर ईसाई। फिर "शहरी नक्सल।" फिर "टुकड़े टुकड़े गैंग।" फिर वह हिंदू जो सवाल पूछे। फिर वह हिंदू जो किसी मुसलमान का दोस्त हो। फिर वह हिंदू जो किसी दलित के साथ खड़ा हो। आज जो तंत्र मुसलमान को निशाना बना रहा है — कल वही तंत्र आपको निशाना बनाएगा। अगर आप असहमत हुए तो। सातवीं बात: विपक्ष की सबसे बड़ी गलती विपक्ष यह समझ नहीं पाया। या समझना नहीं चाहता। वह सोचता है — जातीय समीकरण बनाओ। गठबंधन करो। सीटें जीतो। लेकिन — जब सामने वाला अगले पचास साल की ज़मीन तैयार कर रहा हो। और आप अगले छह महीने का चुनाव देख रहे हो। तो यह बराबरी का मुकाबला नहीं है। 2024 में यही हुआ। विपक्ष ने सीटें जीतीं। नैरेटिव नहीं जीता। "हिंदू खतरे में है" — यह नैरेटिव आज भी वैसा ही मज़बूत है। क्योंकि नैरेटिव चुनाव से नहीं बदलता। नैरेटिव चेतना बदलने से बदलता है। आखिरी बात: असली लड़ाई कहाँ है Ambedkar ने कहा था — "संविधान चाहे कितना भी अच्छा हो — अगर उसे लागू करने वाले लोग बुरे हों तो वह बुरा साबित होगा।" लेकिन "अच्छे लोग" कैसे बनते हैं? स्वतंत्र चेतना से। और स्वतंत्र चेतना तब बनती है जब आप पूछते हैं — "यह डर मुझे किसने दिया?"*ल "यह गुस्सा कहाँ से आया?" "क्या मैंने खुद देखा — या मुझे दिखाया गया?" जब आप यह सवाल पूछते हैं — तो आप उस conditioning से बाहर निकलते हैं। और जब आप बाहर निकलते हैं — तो आपको दिखता है कि — आपका असली दुश्मन वह मुसलमान नहीं है जो आपके बगल में रहता है। आपका असली दुश्मन वह तंत्र है — जो आपको उस मुसलमान का दुश्मन बनाकर — खुद आपकी जेब काट रहा है। महंगाई बढ़ी — आप मुसलमान को कोसते रहे। बेरोज़गारी बढ़ी — आप मुसलमान को कोसते रहे। बच्चे की पढ़ाई महंगी हुई — आप मुसलमान को कोसते रहे। और जिसने महंगाई बढ़ाई, बेरोज़गारी बढ़ाई, पढ़ाई महंगी की — वह आराम से बैठा रहा। संविधान कागज़ पर नहीं मरता। संविधान तब मरता है — जब नागरिक यह सोचना बंद कर दे कि — "क्या मैं सच में स्वतंत्र रूप से सोच रहा हूँ?" इसे शेयर करें। क्योंकि आज जो दुश्मन है — कल आप हो सकते हैं। और जब आप होंगे — तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी।